मेरी चुदाई का शौक-5

आप लोगो पिछले भाग मेरी चुदाई का शौक 4 में जो पढ़ा अब उसके आगे लिख रही हु … यह सुन के अनिल जोश से भर गये और मेरे होंठों गालों को मुंह में भर के चूसने लगे। में भी मस्ती में उनका साथ दे के अपने योवन रस को लुटवाने लगी। अब उन्होंने मेरी गोरी चुनमूनियाँ को फैलाया और एक ऊँगली अंदर घुसा दी। में इस अचानक हुए हमले के लिए तयार नही थी। मेरी सिसकारी निकल गयी।
में: हायो रब्बा! ओऊह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्! आह्ह्ह्ह्ह! ऊईईईईई!
अनिल: क्या हुआ, बेबी?
में: अंकल, प्लीज़ बाहर निकालो ना ….. मुझे दर्द हो रहा हे
अनिल: बेबी, तुम तो पनिया गयी हो! देखो कितने आराम से ऊँगली खा रही हे तुमारी चुनमूनियाँ।
यह बोल के अंकल ने ऊँगली अंदर बाहर करना चालू कर दी। सही में बड़े आराम से अंदर बाहर ही रही थी।
अनिल: बेबी, तुमारी चुनमूनियाँ अंदर से बड़ी गरम हे।
में: हायो रब्बा ऊई आह ओह ओह उह्ह उह्ह उह्ह
अनिल: बेबी, मेरा लंड चूसोगी?
में: अंकल, यह भी कोई चूसने की चीज हे?
पर अनिल पे हवस का भूत सर चढ़ के बोल रहा था, वह मेरी चुनमूनियाँ से ऊँगली निकाल के मेरी छाती पे चढ़ गये और अपने विशाल कड़क लिंग को मेरे मूंह पे मलने लगे।
में: अंकल, आपका बहुत बड़ा हे।
अनिल (सवालिया आँखों से): नही बेबी, यह तो नार्मल साइज़ का हे।
में: नहीं अंकल, इतना बड़ा मेने कभी नही देखा।
अनिल (मुस्कुराते हुए): रिया बेबी, तुमने कितने लंड देखे हैं?
में अपनी गलती समझी पर तब तक देर हो गयी थी। मेरा राज़ खुल गया था ओर अब अनिल अंकल मुझ पे हावी होते चले गये। अनिल मेरे जिस्म को नोच नोच के निशान डाल रहे थे, ख़ास करके जांघों, चुतडों, चूंचियों ओर टांगों पे। में घबरा रही थी कहीं कोई आ गया तो क्या होगा। मेरे अंदर डर और उतेजना का मिला जुला भाव उफान भर रहा था। फिर तभी अनिल ने मेरी टांगें ओर चोड़ी करके खोली अपनी एक ओर ऊँगली घप से घुसेड दी, मेरी चीख निकल गयी पर अनिल ने कोई रहम नही दिखाया ओर अब उनकी दो ऊँगलीयां मेरी टाइट चुनमूनियाँ की गहराई ओर चोडाई नापने में जुट गयी। धीरे धीरे हवस का मज़ा मेरे डर पे हावी होने लगा था, अनिल भी एक कलाकार की भांति मेरे अंदर की चालू कुड़ी को बाहर निकाल रहा था।
अनिल: बेबी, बोलो ना तुमने कितने लंड देखें हैं अब तक?
में: अंकल, वो वो एह वो एह एह ह्म्म्म …. ( (मेरी बोलती बंद हो गयी थी, मेरा राज़ खुल चूका था ओर इसीलिए अनिल मुझ पे जोश से सराबोर टूट पड़े थे।) दोस्तों आप लोग यह कहानी गुरुमस्ताराम डॉट कॉम पर पढ़ रहे है |
में: अंकल, वो … वो बस एक ही देखा हे।
अनिल: किसका?
में: एक स्कूल का सीनियर है।
अनिल: उसी ने ली थी क्या तुमारी चुनमूनियाँ?
में शर्म से पानी पानी हुए जा रही थी। पर में जितना शरमाती अनिल उतना ही हावी हो के मेरी चुनमूनियाँ में ऊँगली करते। अब तो उनकी दो उँगलियाँ भी सटासट अंदर बाहर हो रही थी जिस कारण में अपने चरम के करीब पुहंच गयी थी। में अपने चुनमूनियाँड उठा उठा के उनकी उँगलियाँ लेने लगी। यह देख के अनिल के चेहरे की हैरानी ओर उनकी आँखों में हवस की चमक बढ़ गई थी। उन्होंने मेरे होंठों को अपने मूह में भर दिया ओर रस चूस चूस के मेरे होंठ पीने लगे। साथ ही निचे उनकी उंगलियों ने अपनी करामात दिखाते हुए मेरा काम कर दिया। में तेज़ तेज़ झटके खाती हुई झड़ने लगी ओर अपना चुनमूनियाँ-रस अनिल की उंगलियों ओर हाथो पे फेंकने लगी।
में बिस्तर पे निढाल पड़ी हुई थी। मेरी चुनमूनियाँ ओर जाँघें भीग चुकी थी मेरे कामरस से। मेरी आंखें बंद थी ओर में मंद मंद मुस्कुराते हुए ओरगास्म का मज़ा ले रही थी की तभी एक कठोर झटके ने मेरे होश उड़ा दिए। अनिल ने अपने तन से सारे कपडे जुदा करके साइड को रख दिए थे ओर उनका मूसल समान लंड मेरे अंदर थोड़ी जगह बना चूका था। मेरी चीख निकली पर उन्होंने मेरा मूह बंद करके एक करारा शॉट मारा जिस से उनका पूरा सुपाडा मेरी टाइट चुनमूनियाँ में घुस गया। मैं दर्द से तड़प रही थी ओर अनिल को धक्के दे के पीछे हटाने की कोशिश करने लगी।
अनिल पक्का खिलाडी था। उसने भी आव देखा ना ताव और लंड को अंदर घुसेड के ही रुका। पूरा लंड मेरी कमसिन चुनमूनियाँ में ठेलने के बाद वो रुका और अपनी सांसें सँभालने लगा। मेरी हालत ऐसी थी जेसे कोई छुरी कलेजे में उतार दी हो, जेसे कील ठोक दी हो दिल की गहराई में। कुछ देर यूँ ही पड़े रहने के मेने अनिल से लंड बाहर निकालने की गुज़ारिश की। वह लंड बाहर निकाल के मेरी चुनमूनियाँ को निहारने लगे। फिर मुस्कुरा के पुछा… दोस्तों आप लोग यह कहानी गुरुमस्ताराम डॉट कॉम पर पढ़ रहे है |
अनिल: बेबी, तुम अब लडकी से औरत बन गयी हो, केसा लगा मेरा लंड?
में : स्स्स्स्स्स्स्स्…, उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्… अंकल, मुझे बोहत तेज़ जलन हो रही हे! लगता मेरी फट गयी हे!
अनिल : बेबी, तुमारी तो पहले ही थोड़ी फटी हुई थी, आज पूरी फाड़ के तुम्हे औरत बना दिया हैं। अब तुम किसी भी मर्द को झेल सकोगी।
में: ऊ ऊ ऊ ऊह्ह! जलन हो रही हे, अंकल। कुछ करो भी अब।
अनिल ने मेरी हालत को समझा और मेरी टांगों के बीच झुक गये। फिर अपना मूह मेरी चुनमूनियाँ पे ले जा के अपनी लम्बी जीभ निकाली ओर मेरी जलती हुई चुनमूनियाँ पे रख दी। मेरी चुनमूनियाँ को जलन से आराम मिला जब अनिल अंकल ने अपनी जीभ से मेरी चुनमूनियाँ को चाटना शुरू किया। मेरे लिए एक नया एहसास था यह ओर कुछ ही पलों में मेरी जलन खत्म हो चुकी थी। अब में अंकल की इस अत्यंत रोमांचकारी हरकत से मंत्रमुग्ध हो गयी। मेरे अंदर फिर से एक नये चरम तक पहुँचने की लालसा जाग गयी। अंकल मेरे चुनमूनियाँद्वार में जीभ घुसेड के दाएं बाएँ घुमा के मुझे पागलपन की हद तक मज़ा दे रहा थे। फिर जीभ को चुनमूनियाँ से बाहर निकाल के मेरे क्लाइटोरिस की सेवा करने में जुट गये।
में: ऊफ़्फ़्फ़्फ़्फ़ अंकल, अह्ह्ह्ह आह ऊफ़्फ़्फ़्फ़्फ़! मर गयी! हाय रब्बा!
अनिल: ऊह, आह बेबी, तुमने मुझे जन्नत में पहुंचा दिया है! मुझे उम्मीद नही थी की इतनी नादान सी दिखने वाली सरदारनी इतना मज़ा देगी।
में: अंकल, आप ने मुझे जितना मज़ा दिया आज तक किसी ने नही दिया था। में हर वक़्त तरसती थी कोई मुझे ऐसा प्यार करे जेसा अभी आप कर रहे हो। अनिल अंकल ने फिर मेरी आँखों में देखा और दोबारा जीभ से मेरी चुनमूनियाँ के हर हिस्से को चाटने में जुट गये। में भी खुल के सिस्कारियां भरती हुई जीभ ओर चुनमूनियाँ के मिलन से उठने वाली तरंगों में झूमने लगी। में अब चरम के पास पहुँच गयी थी। मेरी सांसें गहरी ओर तेज़ हो गयी। पेट की गहराई में ज्वारभाटा बढ़ने लगा! आँखों के सामने सतरंगी सितारे चमकने लगे ओर फिर बाँध टूट गया। में झड़ रही थी। मेरा जिस्म ऐसे झटके खा रहा था मानो ४४० वोल्ट की करंट लगी हो। मेरी चुनमूनियाँ से कामरस बहने लगा जिसे अनिल ख़ुशी ख़ुशी चाटने लगे। दोस्तों आप लोग यह कहानी गुरुमस्ताराम डॉट कॉम पर पढ़ रहे है | मेरी चुनमूनियाँ से बहते कामरस की आखरी बूँद चाट लेने के बाद अनिल सीधे हुए और अपना विशाल सख्त लंड मेरी लिसलिसी चुनमूनियाँ के मुंह पे लगा के बोले
अनिल: बेबी, अब तुमको इतना मज़ा आयेगा कि मानो जन्नत की सैर कर रही हो।
में: अंकल, मैं तो झूम रही हूँ, ऐसा लगता हे जेसे हवा में उड़ रही हूँ।
अनिल ने लम्बी सांस भरी और अपने मरदाना लंड को कमसिन चुनमूनियाँ में उतारने लगा और तब तक उतारता रहा जब तक पूरा लंड जड़ तक अंदर ना समा गया। मुझे पहली बार के मुकाबले कम दर्द हुआ ओर इस बार मस्ती से लंड लेके अनिल के पेट और छाती से खुद को चिपका ली मानो छिपकली छत से चिपक गयी हो। मेरी टांगें अनिल की कमर के आसपास लिपटी हुई थी और बाहों का हार उनके गले में था। मेने अपने हलके जिस्म को अनिल के कठोर बदन से ऐसे चिपका लिया कि सिर्फ मेरे पैर ओर सिर बिस्तर से लगे हुए थे बाकी का नंगा जिस्म अनिल से चिपका हुआ था। अनिल मेरी हरकत देख परेशान हुए पर जल्दी खुद को सँभालते हुए पूरे जोश से लंड बाहर खींच के जबरदस्त धक्का मारते हुए मुझे बिस्तर में धंसा दिया और लंड फिर से जड तक मुझ में समा गया। फिर से एक बार दोबारा लंड बाहर खींचते हुए अनिल ने जबरदस्त तरीके से मेरी रसीली चुनमूनियाँ में प्रहार किया जिस से उनका सुपाडा मेरी कमसिन कोख से जा टकराया। मेरी चीख निकल गयी और आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
में बेहोश हो गयी पर जब मुझे होश आया तो मैंने देखा कि अनिल मुझे पूरी ताक़त से रगड़ रहे थे। में चुदती रही, अनिल चोदते रहे। मुझे अब एहसास होने लगा की में जल्दी अपने चरम तक पहुँच जाउंगी सो मेने भी अनिल की ताल से ताल मिलाते हुए नीचे से चुनमूनियाँड़ उठा उठा के अपनी चुनमूनियाँ में लंड लेना प्रारम्भ किया। जल्दी ही वो घडी आ गयी जब अनिल अपने अंडाशय में उबलते हुए ज्वालामुखी को रोक नही पाए। वे अपने लंड को बाहर खींच के मेरे जिस्म पर अपने गरम वीर्य की वर्षा करने लगे। में भी आंखें बंद करके अपने नंगे जिस्म पे गिरती वीर्य की बौछारों को महसूस करती अपने चरम को प्राप्त हुई।

कहानी जारी रहेगी आगे की कहानी अगले भाग में पढ़िए |