चुदाई के इस दलदल में फँस कर चुदक्कड़ बन गयी भाग – ४

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:
चुदाई के इस दलदल में फँस कर चुदक्कड़ बन गयी भाग – 3

मैं अपनी ससुराल में काफी खुश थी। मुझे बहुत अच्छा ससुराल मिला था। निखिल की बहुत ही अच्छी नौकरी थी। वो एक कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर थे। काफी अच्छी सैलरी और पर्क्स थे। मुझे मेरी प्यारी सहेली एक ननद के रूप में मिली थी। हम दोनों में खूब घुट्टी थी। दीपक कभी-कभी आता था मगर मैं उससे हमेशा बचती थी। अब उसका साथ भी अच्छा लगने लगा था। उसने नीता के प्रेगनेंनसी की बात झूठी सुनायी थी, जिससे कि मैं विरोध छोड़ दूँ। लेकिन दीपक ने मुझे ग्रूप सैक्स का जो चस्का लगाया था उसे दीपक और दिनेश ने जम कर हवा दे दी थी। अब हालत यह थी कि मुझे एक से चुदवाने में उतना मजा नहीं आता था, लगता था सारे छेद एक साथ बींध दे कोई।

नीता और दीपक दोनों खूब चुदाई करते थे। निखिल कभी-कभी कईं दिनों तक बाहर रहता था और तब मुझे सैक्स की भूख बहुत सताती थी। मैं दीपक को ज्यादा लिफ्ट नहीं देना चाहती थी। दीपक की ज्वाईंट फैमिली थी। उसमे उसके अलावा दो बड़े भाई और दो बहनें थीं। दो भाई और एक बहन की शादी हो चुकी थी। अब दीपक और सबसे छोटी बहन बची थी सिर्फ। नीता की शादी एक साल बाद दिसंबर के महीने में तय हुई। उसकी शादी गाँव से हो रही थी। मैं पहली बार उसकी शादी के सिलसिले में गाँव पहुँची। वहाँ आबादी कुछ कम थी। पुराने तरह के मिट्टी के मकान थे। निखिल के परिवार वालों का पुशतैनी मकान अच्छा था। उसके ताऊजी वहाँ रहते थे।

मुझे खुली-खुली हवा में सोंधी-सोंधी मिट्टी की खुशबू बहुत अच्छी लगी। कमरे कम थे इसलिये एक ही कमरे में जमीन पर बिस्तर लगता था। शाम को जिसे जहाँ जगह मिलती सो जाता। एक रात को मैं काम निबटा कर सोने आयी तो देखा कि मेरे निखिल के पास कोई जगह ही नहीं बची। वहाँ कुछ बुजुर्ग सो रहे थे। बाकी सब सो चुके थे, सिर्फ मैं और माताजी यानि मेरी सास बची थी। वो भी कहीं जगह देख कर लुढ़क पड़ी। मैंने दो कमरे देखे मगर कोई जगह नहीं मिली। फिर एक कमरे में देखा कि बीच में कुछ जगह खाली है। सर्दी के कारण सब रजाई ओढ़े हुए थे और रोशनी कम होने के कारण पता नहीं चल रहा था कि मेरे दोनों तरफ़ कौन-कौन हैं। मैं काफी थकी हुई थी इसलिये लेटते ही नींद आ गयी। मैं चित्त होकर सो रही थी। बदन पर एक सूती साड़ी और ब्लाऊज़ था।

सोते वक्त मैं हमेशा अपनी ब्रा और पैंटी उतार कर सोती थी। अभी सोये हुए कुछ ही देर हुई होगी कि मुझे लगा कि कोई हाथ मेरे बदन पर साँप की तरह रेंग रहा है। मैं चुपचाप पड़ी रही। वो हाथ मेरी चूंची पर आकर रुके। उसने धीरे से मेरी साड़ी हटा कर मेरे ब्लाऊज़ के अंदर हाथ डाला। वो मेरे निप्पलों को अपनी अँगुलियों से दबाने लगा। आप ये कहानी न्यू हिंदी सेक्स कहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है | मैं गरम होने लगी उसकी हर्कतों से। मैंने कोशिश की जानने की कि मेरे बदन से खेलने वाला कौन है।

मगर कुछ पता नहीं चला क्योंकि मैं हिल भी नहीं पा रही थी। वो काफी देर तक मेरे निप्पलों से खेलता रहा। उसकी हर्कतों से मेरे निप्पल सख्त हो गये और मेरी चूंची भी एक दम ठोस हो गयी। अब उसके हाथ मेरी नंगे पेट पर घूमते हुए नीचे बढ़े। उसने अपना हाथ मेरी साड़ी के अंदर डालना चाहा लेकिन नाड़ा कस कर बँधा होने के कारण वो अपना हाथ साड़ी के अंदर नहीं डाल पाया। उसने मेरी साड़ी उठानी शुरू कर दी।

साड़ी कमर तक उठ गयी तो उसके हाथ अब मेरी टाँगों के जोड़ पर फिरने लगे। बाद में जब मेरी चूत पर हाथ फिरने लगा तो मैंने बहुत धीरे से अपनी टाँगें कुछ खोल दीं। उसकी एक अँगुली अंदर मेरी चूत पर फिरने लगी। मैं बुरी तरह गरम हो गयी थी। उसने अपना लंड मेरे बदन से सटा दिया और मेरे बदन पर अपना लंड रगड़ने लगा। मुझे लग रहा था की वो अपने लंड को मेरे अंदर कर दे मगर मैं शरम से चुप थी और वो भी शायद पकड़े जाने से डर रहा था। उसने मेरे बदन से अपना लंड रगड़ते हुए अपना वीर्य छोड़ दिया। फिर वो अलग हट कर सो गया मगर मेरी नींद उड़ गयी थी। मुझे पता नहीं चल पा रहा था कि क्या करूँ।

मैंने अपनी ब्लाऊज़ के बटन खोल लिये। कुछ देर तक अपनी अँगुलियों से ही अपनी चूत को दबाती रही मगर गर्मी बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो मैं अपने दूसरी तरफ सो रहे आदमी के रजाई में घुस गयी और उसके बदन से अपना बदन रगड़ने लगी। बगल में जो भी सो रहा था कुछ ज्यादा उम्र का था मगर बदन से गठीला था। मैं अपने बदन को उसके बदन पर रगड़ने लगी मगर वो शायद गहरी नींद में था इसलिये उसके शरीर में कोई हर्कत नहीं हुई।

मैंने अपने होंठ उसके निप्पल पर रख दिये और जैसे कोई किसी लड़की के निप्पल चूसता है उसी तरह उसके निप्पलों को चूसने लगी। अपने होठों को अब मैं उसके घने बालों से भरे सीने पर फिराने लगी। मुझे वैसे ही बालों से भरा बदन अच्छा लगता है। मैंने अपना हाथ उसके बदन पर फिराते हुए धीरे से लंड के ऊपर रखा। उसने एक धोती पहन रखी थी। मैं उसकी धोती को एक तरफ करके अंदर से उसके लंड को निकाल कर सहलाने लगी। उसका लंड ढीला था।

मैं उसे कुछ देर तक हाथ से सहलाती रही। सहलाने से उसके लंड में हल्की सी हर्कत हुई। मुझसे नहीं रहा जा रहा था। मैं किसी बात की परवाह किये बिन उठा कर बैठ गयी और उसके ढीले लंड को अपने मुँह में भर लिया। उसके लंड को जीभ से और होंठों से चाटने लगी। उसका लंड अब खड़ा होने लगा। मैं उत्तेजना में अपने चूंचियों को अपने हाथों से मसल रही थी। मेरी चूत से पानी रिस रहा था। जब मैंने देखा कि उसका लंड पूरी तरह तन गया है तो मैं ऊपर उठी और उसके कमर के दोनों ओर अपने पैरों को फैला कर बैठ गयी। मैंने अपने हाथों से उसके लंड को पकड़ कर अपनी गीली चूत पर सैट किया और दूसरे हाथ से अपनी चूत की फाँक को फैला कर लंड के सामने के सुपाड़े को अंदर किया। फिर अपने हाथों को वहाँ से हटा कर उसके सीने पर रखा और अपने बदन का बोझ उसके लंड पर डाल दिया। उसका लंड काफी मोटा था। वो मेरी चूत की दीवरों को रगड़ता हुआ पूरा अंदर चला गया।

मैं उसके लंड पर बैठ गयी थी। मेरी इस हर्कत से उसकी नींद खुल गयी। मैं उसके शरीर में हर्कत देख कर झट उसके सीने पर झुक गयी और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये जिससे कि वो अचानक नींद से उठ कर कुछ बोल नहीं पड़े। मगर मैंने देखा कि वो चुप ही रहा। उसके हाथ मेरे बदन पर फिरने लगे और फिर उसके हाथों ने मेरी दोनों चूंचियों को थाम लिया। मैंने उसके सीने का सहार लेकर अपनी कमर ऊपर नीचे करने लगी। वो भी मेरे चूंचियों को मसलता हुआ हर धक्के के साथ अपनी कमर ऊपर उठा रहा था। मेरी चूंचियों को जोर जोर से चूसते हुए अपने दाँतों से काट रहा था। दाँतों से काटने की वजह से काफी दर्द हो रहा था मगर मैं अपने निचले होंठ को दाँतों में दबा कर मुँह से कोई भी आवाज निकलने से रोक रही थी।

मेरे बाल मेरे चेहरे पर खुल कर बिखर गये थे। अँधेरे में पता ही नहीं चल रहा था कि मैं किस का लंड अपनी चूत के अंदर ले रखी हूँ। शायद उसे भी खबर नहीं होगी। कुछ देर तक इसी तरह उसे ऊपर से धक्के लगाने के बाद मेरी चूत ने पानी चोड़ दिया मगर मेरी चूत की प्यास अभी नहीं बुझी थी। उसने अब मुझे नीचे लिटा दिया और मेरे टाँगों को फैला कर दोनों हाथों से पकड़ लिया। अब वो अपना लंड मेरी चूत से सटा कर धक्का लगाने लगा। फिर से धक्के शुरू हुए। काफी देर तक इसी तरह करने के बाद मुझे उठाकर अपनी गोद में पैर फैला कर बिठा लिया और मैं उसकी गोद में बैठ कर कमर उचकाने लगी। उसने मेरे निप्पलों को मुँह में भर लिया और उन्हें चूसने लगा। मैंने अपने हाथों से उसके मुँह को अपने सीने पर दबा दिया। आप ये कहानी न्यू हिंदी सेक्स कहानी डॉट कॉम पर पढ़ रहे है | वो मेरी चूंचियों को मुँह में भर कर चूसने लगा।

मेरे निप्पलों को दाँतों से दबा रहा था। कुछ देर तक इस तरह करने के बाद मुझे वापस बिस्तर पर लिटा कर मेरे टाँगों को अपने कँधे पर रख लिया और फिर जोर जोर से चोदने लगा। अब वो झड़ने के करीब था। मैं उसकी उत्तेजना को समझ रही थी। वो अब मेरे चूंची के साथ बहुत सख्ती से पेश आ रहा था। उसकी अँगुलियाँ मेरी नाज़ुक चूंचियों को बुरी तरह मसल रही थी। दर्द के कारण कईं बार मुँह से चीख निकलते निकलते रह गयी। मैंने अपने निचले होंठ को दाँतों में दबा लिया।

उसने एक जोर का धक्का लगाया और उसके लंड से गरम गरम फ़ुहार मेरी चूत के अंदर पड़ने लगी। मैंने उसे खींच लिया और उसके होंठों और चेहरे पर कईं चुंबन दिये। उसी के साथ मैं भी तीसरी बार झड़ गयी। मैंने उत्तेजना में अपने लम्बे नाखून उसकी नंगी पीठ पर गड़ा दिये। वो थक कर मेरे ऊपर ही लेट गया। जब उसका लंड ढीला पड़ गया तो वो मेरे सीने से उतर कर मुझसे लिपट कर सो गया। मैं भी तीन बार स्खलित होके उसके होंठों से अपने होंठ लगाये हुए सो गयी।

मैं सुबह पाँच बजे उठ जाती हूँ। आज जब उठी तो कमरे में अँधेरा था। मैं अपने बगल वाले से चिपकी हुई थी। दूसरी तरफ वाला भी अपनी एक टाँग मेरे ऊपर चढ़ा रखा था। मैंने अपने को उन दोनों से छुड़ाया और धीरे-धीरे उनके नीचे से अपने कपड़ों को खींच और फिर अँधेरे में ही उन्हें पहन कर कमरे से बाहर निकलने लगी। तभी खयाल आया कि एक बार देखूँ तो सही कि कौन थे रात को मेरे साथ। मैंने लाईट जलायी तो उन्हें देखते ही चौंक गयी। वहाँ एक तरफ तो नैनीताल वाले फ़ुफ़ा-ससुर सोये हुए थे और मुझे रात भर चोदने वाला और कोई नहीं मेरे अपने ससुर जी थे यानी नीता और निखिल के पिताजी। मैं तुरंत लाईट बँद करके वहाँ से भाग गयी।

मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं ये सोच कर अपने दिल को तसल्ली दे रही थी कि शायद उन्हें पता नहीं चला है कि रात को उन्होंने किसके साथ चुदाई की है। मैंने एक सलवार कुर्ता पहन रखा था, जिसका गला काफी खुला हुआ था। मैं सुबह अपने ससुर को चाय देने के लिये जब झुकी तो मेरा गला और ज्यादा खुल गया। उठते हुए मेरी नज़र उनसे मिली वो मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे। मैंने अपनी चूंचियों की तरफ देखा। खुले गले से लाल-लाल दाँतों से बने निशान उनकी आँखों के सामने रात की कहानी का ब्योरा दे रहे थे। मैं शर्मा कर अपनी नज़र झुका कर वहाँ से भाग गयी। उस दिन शाम को उन्होंने अकेले में मुझे पकड़ लिया। मैं तो एक दम घबड़ा गयी थी। उन्होंने मेरी चूंचियों को मसल कर कहा “अब रोज हमारे साथ ही सोया कर।

तेरे नैनीताल वाले ससुर जी भी यही कह रहे थे।” “धत्त” कह कर मैं अपने आप को छुड़ा कर वहाँ से भाग गयी लेकिन हर दिन मैं वहीं सोयी। उन दोनों बुढ्ढों के बीच। दोनों के साथ खूब खेली कुछ दिनों तक। शादी वाले दिन बारात के साथ स्वप्निल आया था। मैं उसे देख कर शर्मा गयी। उससे नज़र बचा कर थोड़ा अलग हो गयी। मगर उसकी निगाहें तो मुझे ही ढूँढ रही थी। शादी घर से कुछ दूर हो रही थी। एक बार मैं किसी काम के लिये शादी के मंडप से घर आ रही थी। गाँव में जैसा होता है… रास्ते में अँधेरा था। अचानक भूत की तरह स्वप्निल सामने आया।

“अंजलि” उसने आवाज लगायी। मैं रुक गयी। “क्या बात है मुझे बहुत जल्दी भूल गयी लगता है”

“कौन है तू… मेरा रास्ता छोड़ नहीं तो अभी आवाज लगाती हूँ… तेरी ऐसी हजामत होगी कि खुद को आईने में नहीं पहचान पायेगा” मैंने नासमझ बन कर कहा।

“नो बेबी तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगी…” उसने कड़कते हुए कहा, “मेरे पास तेरी सी.डी अभी भी है… बोल चला दूँ क्या तेरे ससुराल वालों के सामने… कहीं भी मुँह नहीं दिख पायेगी।”

यह सुनते ही मैं सकपका गयी। “क्या चाहते हो तुम? देखो मैं वैसी लड़की नहीं हूँ… एक अच्छे घर की बहू हूँ… तुम मुझे जाने दो।” मैंने उससे कहा।

“तो हम भी कौनस तुझे कुछ कहने वाले हैं। इतने दिनों बाद मिली हो… बस एक बार हमारे ग्रुप का मन रख लो… फिर तुम अपने घर हम अपने घर।” उसने मुझे मेरा हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा।

“देखो मैं अगर लेट हो गयी तो लोग मुझे ढूँढते हुए यहाँ आ जायेंगे… छोड़ो मुझे।”

“ठीक है अभी तो छोड़ देते हैं लेकिन तुझे रात को आना पड़ेगा… नहीं तो उस फ़िल्म की कॉपियाँ तेरी ससुराल में सबको फ़्री में बँटवा दुँगा” कहकर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया। मैं छूटते ही भागी तो उसने पीछे से आवाज लगायी “हमें इशारा कर देना कि कहाँ चलना है… जगह ढूँढना तेरा काम है”

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